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: 'सम्पादकीय लेख' "शोहरतें गुमनाम हो जायेंगी,शख्सीयत खास से आम हो जायेंगी"

✍️जगदीश सिंह सम्पादक✍️ *जरा सा लड़़खड़ा कर देखो कि कौन अपना है, जहां गिरे थे वहीं शाम भी हो जायेंगी* हकीकत के धरातल पर सच की इबारत दिल के सतह से जब छन कर बाहर निकलती है तब ज़िन्दगी का दस्तूर जो हर रोज गुरूर बनकर मचलता है, आईने के तस्वीर के तरह झलकने लगता है। मन के आंगन में वैराग्य का पौधा पनपने लगता है जिधर भी नजर घुमाएं हर तरफ स्वार्थ के वारिश में भीगते लोग उम्मिदो की छत के तरफ भागते नजर आयेंगे। ज़िन्दगी रंजोगम के आवरण में विचरण करती उम्र के रथ पर सवार निरन्तर आखरी मंजिल की तरफ न चाहते हुए भी बढ़ती रहती है। गुजरता हर पल नियति के निरन्तर‌ संचालन में वेखौफ‌ अपनी सत्ता के आधीन तमाम व्यवधान के बावजूद अपने वजूद‌ को कायम रखकर‌ अपनी स्मिता को स्थिर‌ रखने में कामयाब रहता है। मानव तन धारण कर तमाम योनियों से भटकता जीव‌ जब मृत्यू लोक के बहुआयामी घनत्व में अपने महत्व को तलासता है तब उसे इस मायावी लोक में केवल मतलब परस्ती की बाजार‌ ही नसीब होती है। जहां बेकदरी के आलम में विवेकहीन ज़िन्दगी की दर्द भरी कहानी का पात्र बनकर रह जाना पड़ता है! पता नहीं जीवात्मा को परमात्मा ने प्रारब्ध बस इस नश्वर संसार में उद्धार‌ के लिए प्रत्यर्पित करते हैं या कर्म फल भोगने के लिए भेजते हैं! मगर जो कुछ दिखाई देता है उसमें तो यह स्पष्ट हो जाता है विधाता के कायनात में अकस्मात कुछ भी नहीं सब कुछ पूर्व निर्धारित कर्म फल आधारित ही मिलता है! नश्वर शरीर में तकदीर का सितारा उम्र के पालने में ही पुष्पित-पल्लवित होता है लेकिन जब प्रारब्धीय खेल शुरू होता है तब मालिक की कायनाती व्यवस्था में चुन चुन कर हिसाब भी लिया जाता है!मगर अहंकार के वशीभूत मृगतृष्णा में जीवन‌ जीने वाले अज्ञानी मानव को ज्ञान का आभाष तब होता है जब मिट्टी की काया में ऊर्जा संचालित करने वाली इन्द्रियां ज़बाब देने लगती है!मस्तिष्क में गुजरे लम्हों की यादें चल चित्र की तरह पर्दे पर चलने लगती है!अश्कों की धार मुखड़े पर बेशुमार‌ दर्द समेटे रात्रि के गहन अन्धकार में बहने लगती है।उदास मंजर में गुजरता निशा का हर पहर क्लेश के साथ यह सन्देश देता है ये मूर्ख मानव तेरा यहां कोई नहीं! किस भ्रम जाल में फंसकर अपने वजूद को मिटा रहे हो। बदलता वक्त इस कदर बेरहम हो चला है कि हर आदमी मतलब परस्ती का चोला ओढ़ें मतलब भर साथ रहने के बाद ट्रेन के मुसाफिर की तरह कुछ देर मे ओझल हो जा रहा है!सम्बन्ध को अनुबंध के साथ जीने वालो का फार्मूला आधुनिकता की कसौटी पर आधुनिक जमाने का फंडा बन गया है!जरूरत भर साथ रहने के बाद ज़िन्दगी के आखरी सफर के सुनसान राहों में भटकने वाले मां बाप को पराया बना देने का आजकल चलन हो गया है! यह सभी को पता है गुजरे अतीत को वर्तमान दोहराता है!जो कर्म के खेत में बोया वहीं हर कोई पाता है? समय के रहते प्रारब्ध के पारितोषिक को भविष्य में सुरक्षित रखने के लिए नेकी की खेती कर लो भाई साथ कुछ नहीं जायेगा!सब कुछ यहीं रह जायेगा। !सबका मालिक एक 🕉️ साई राम 🙏🏿🙏🏿जगदीश सिंह सम्पादक, राष्ट्रीय अध्यक्ष "राष्ट्रीय पत्रकार संघ भारत" मो० 7860503468

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