: सामाजिक सौहार्द,आस्था व विश्वास का महापर्व छठ/सूर्य षष्ठी आज
बलिया।आस्था और श्रद्धा का महापर्व छठ/सूर्य षष्ठी बलिया जनपद में लम्बे समय से मनाया जाता है पहले शहर के लोग/व्रती महिलाएं/श्रद्धालु शहर के दक्षिणी तरफ जो नदी के किनारे महाबीर घाट, बालेश्वर मन्दिर(शनिचरी)घाट,गौशाला रोड घाट और पूरब तरफ ग्रामीण क्षेत्रों जमुआ,बाबुराम तिवारी के छपरा(शिवराम पुर),नगवां जनाड़ी, पाण्डेय पुर,दुबहर और पश्चिम तरफ बिजयीपुर हैबतपुर,माल्देपुर,सागरपाली,थमनपुरा,कोट अजोरपुर तक मजमा ही मजमा हुआ करता था। मेले का माहौल था,समाजसेवी संस्थाएं घाट की साफ-सफाई कर बिजली बत्ती की सजावट से लेकर ध्वनिविस्तारक यंत्र से अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करें,दीया जलाने समय इस बात का ध्यान रखें कहीं कोई आग लगने की घटना न घट जाय आदि घोषणाएं किया करते हैं। समय के साथ नदी के किनारे कब्जा हो जाने/आवास बन जाने तथा शहर की अनियंत्रित भींड़ के कारण कुछ तब्दीलियां होनी शुरु हो ग ई,शहर के राम लीला मैदान,भृगु मन्दिर प्रांगण या अन्य खुले स्थानों पर इसकी शुरुआत हुई जो जरुरी भी था। गांवों में तालाब पोखरों के किनारे तो यह पर्व मनाया ही जाता था अब छतों पर भी इसकी शुरुआत कुछ वर्षॊं से हो ग ई है।
पहले महिलाएं/व्रती/श्रद्धालु जल में घंटों खड़ी रह कर सूर्यास्त का इंतजार करती रहती थी और बिल्कुल डूब जाने की स्थिति में हो जाने पर अर्घ/पूजन का कार्यकरती थी,फिर सुबह जैसे ही सूर्य उदय होने को होता है लालिमा की शुरुआत होते ही अर्घ पूजन कर व्रत को परिपूर्ण मानकर सामाजिक समरसताकायम रखते हुए प्रसाद का आदान-प्रदान व एक दूसरे को सिन्दूर लगाने का कार्य भी करती हैं। इसमें या एकदूसरे के पास बैठने में बड़े-छोटे या उच्च-निच का कोई भाव किसी के मन में होता ही नहीं है जिसको जहां स्थान मिला बैठ कर अपना पूजन करता है।
वास्तव में यह व्रत ही बड़े-छोटे/शक्तिशाली-कमजोर के भाव के विपरीत भाव को लेकर शुरू होता है,ऐसे सामाजिक सदभाव ,सौहार्द ,शान्ति ,समृद्धि और सादगी से परिपूर्ण पहले डूबते हुए सूर्य अथार्त हम कमजोर व शक्तिशाली में कोई भेद नहीं करते फिर उगते हुए सूर्य का पूजन यानि हममे किसी तरह का कोई फर्क करने का मन नहीं रहता हम समान भाव से बड़ों-छोटों सभी को आदर व स्नेह करते देते हैं।
ऐसे महापर्व की आप सभी श्रद्धालुओं को बलिया न्यूज 24 की ओर से बहुत बहुत बधाई।
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