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बजट:आंकड़ों का मायाजाल और जनता को उम्मीदों का झुनझुना : बजट में नौजवान,किसान और मजदूर तथा आम आदमी के लिये कुछ भी नहीं-रामगोविन्द चौधरी

बलिया।उत्तर प्रदेश सरकार के नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मंत्री तथा समाजवादी पार्टी के नेता रामगोविन्द चौधरी ने बजट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहाकि हर साल जब वित्त मंत्री लाल ब्रीफकेस (या अब डिजिटल टैबलेट) लेकर संसद की सीढ़ियां चढ़ती हैं, तो देश के करोड़ों लोगों की निगाहें इस उम्मीद में टिकी होती हैं कि शायद इस बार उनकी थाली में रोटी और जेब में कुछ बचत के अवसर बढ़ेंगे। लेकिन संसद के भीतर मेजों की गड़गड़ाहट और बाहर आम आदमी की खामोशी के बीच का अंतर इस बार भी कम होता नहीं दिख रहा।

मेजों की गड़गड़ाहट और कागजों का पुलिंदा



संसद के भीतर जब वित्त मंत्री बजट भाषण की एक-एक पंक्ति पढ़ती हैं, तो सत्ता पक्ष के सांसद उसे ऐतिहासिक बताते हुए मेजें थपथपाते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जब वह भाषण समाप्त होता है और संसद की चौखट से बाहर आता है, तो जनता के हाथ में केवल 'बजट की प्रतियां' ही होती हैं—अधिकारों और राहत का वह वास्तविक हिस्सा गायब रहता है जिसकी उसे दरकार थी।

किसान, मजदूर और नौजवान: हाशिये पर खड़े लोग

इस बजट को यदि बारीकी से देखा जाए, तो समाज के उन स्तंभों के लिए निराशा अधिक दिखती है जो देश की अर्थव्यवस्था की नींव रखते हैं

1. नौजवान: 'रोजगार' शब्द बजट भाषणों में एक रस्म की तरह इस्तेमाल होता है, लेकिन ठोस रोडमैप की कमी युवाओं के लिए इसे महज एक 'झुनझुना' साबित करती है। डिग्रियों के बोझ तले दबे युवाओं को आंकड़ों के खेल से ज्यादा नौकरियों के अवसरों की तलाश है।

2. किसान: एमएसपी (MSP) की कानूनी गारंटी और लागत के दोगुने दाम की मांग आज भी फाइलों के नीचे दबी है। खेती की बढ़ती लागत और अनिश्चित मौसम के बीच किसान को मिली मामूली राहत 'ऊंट के मुंह में जीरा' जैसी है।

3. मजदूर और आम जन: कमरतोड़ महंगाई के दौर में मध्यम वर्ग और मजदूर वर्ग को उम्मीद थी कि टैक्स स्लैब या सब्सिडी के जरिए कुछ सीधी राहत मिलेगी, लेकिन बजट का ढांचा उन्हें फिर से बाजार के रहमों-करम पर छोड़ देता है।

बजट केवल आय और व्यय का लेखा-जोखा नहीं होना चाहिए, बल्कि यह देश के अंतिम व्यक्ति की मुस्कान का दस्तावेज होना चाहिए। जब तक बजट के आंकड़े आम आदमी की रसोई और नौजवान के रोजगार कार्ड तक नहीं पहुंचते, तब तक इसे 'ऐतिहासिक' कहना केवल एक राजनीतिक मुहावरा ही रहेगा। जनता को भाषण नहीं, राशन और शासन में अपनी हिस्सेदारी चाहिए।

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